कश्मकश ज़िंदगी की

आज वक्त के लहरों में खुद को झांका,तकदीर के खोज में कहीं कुछ बदला तो नहीं…गुजरासा वक्त और बदले हालात में,इम्तिहान मेरा तब भी था और आज भी है यहीं… यादों की धागे में खुद को बांधने की आदत जो है,ज़िंदगी के बदलाव में खुद को ढालने की मशक्कत भी है..एक पल में महफिल तोContinue reading “कश्मकश ज़िंदगी की”

Truth & Lie

Portrayed my thoughts into Poetry after watching a “Web Series – illegal…” सच झूठ के इस जंग में,सच कहां जीत पाया है…सच को सच साबित करने में,किसी ने मौत को गले लगाया है… झूठी ज़िंदगी और दिखावे का रुतबा,बदल गया है फितरत भला किसे करे शिकवा.. ना कर वक्त बरबाद अपना ,झूठ को बेनकाब करनेContinue reading “Truth & Lie”