Reply to “wo purane din”

चलो फिर से पुराने दिन को जीने की कोशिश करते हैं…अकेले नहीं, चलो हम साथ में कदम बढ़ाते हैं… मंजिल का भले ही पता न हो, मगर किसी भी राह को चुन लेते हैं…पहले औरों के खता से टूट गए थे, आज चलो खुद ही खता करलेते हैं…. आज चलो हम फिर से पुराने दिनContinue reading “Reply to “wo purane din””

Poetry – Tree

ए – नादान,क्यूं ये धरती को मिटाने चला है..हवाओं में जहर तू घोलने लगा है..ना काट इन पेड़ों को तू,खुद को तबाही के तरफ तू खींचने लगा है… ना मिलेगा छांव , धूप से बचने के लिए..ना नसीब होगी ताजी हवा, खुल के सांस लेने के लिए.. ना हवाएं सरसरायेंगे..ना पंछियों के आवाज से वादियांContinue reading “Poetry – Tree”